Monday, December 3, 2018

जन्मदिवस स्पेशल:जनता के लिए काम करने के लिए अपनी पार्टी तक से इस्तीफा दे दिया था डॉ.राजेंद्र प्रसाद नें

जन्मदिवस स्पेशल:जनता के लिए काम करने के लिए अपनी पार्टी तक से इस्तीफा दे दिया था डॉ.राजेंद्र प्रसाद नें

आज हमारे आज़ाद भारत के सबसे पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की जयंती है और आज उनकी जयंती पर पूरा देश इस वीर और समझदार व्यक्ति को नमन करता है।राजेंद्र प्रसाद का आज ही के दिन 1884 में जन्म हुआ था और वह बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में पैदा हुए थे।वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था। पूरे देश में अत्यन्त लोकप्रिय होने के कारण उन्हें राजेन्द्र बाबू  या देशरत्न कहकर पुकारा जाता था। राजेंद्र प्रसाद एकमात्र नेता रहे, जिन्हें दो बार लगातार राष्ट्रपति पोस्ट के लिए चुना गया। पेशे से वकील राजेंद्र प्रसाद  आजादी के संघर्ष में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शुमार रहे। उन्‍होंने महात्‍मा गांधी की प्रेरणा से वकालत छोड़कर स्‍वतंत्रता संग्राम में उतरने का फैसला किया।

उन्होंने व्यक्तिगत भावी उन्नति की सभी संभावनाओं को त्यागकर गांवों में गरीबों और दीन किसानों के बीच काम करना स्वीकार किया। वह 1950 में संविधान सभा की अंतिम बैठक में राष्‍ट्रपति चुने गए और 26 जनवरी, 1950 से 13 मई, 1962 तक देश के राष्‍ट्रपति रहे। राष्ट्रपति बनने के बाद राजेंद्र प्रसाद ने कई सामाजिक कार्य किए। साथ ही उन्होंने कई सरकारी दफ्तरों की स्थापना की। स्‍वतंत्र ढंग से काम करने के लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। यह एक ऐसी मिसाल थी जो बाद में परंपरा बन गई और अभी भी यह परंपरा जारी है।और वह ऐसा करने वाले पहले नेता थे और उनका यह कदम यह साफ बता देता है कि वह कितने स्वाभिमानी थे और उन्हें पार्टी सो कोई मतलब नहीं था उन्हें सिर्फ जनता की सेवा से मतलब था।

राजेंद्र प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा छपरा (बिहार) के जिला स्कूल से हुई। उन्होंने 18 साल की उम्र में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा प्रथम जगह से पास की। विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें 30 रुपये की स्कॉलरशिप मिलती थी। साल 1915 में राजेंद्र बाबू ने कानून में मास्टर की डिग्री हासिल की। साथ ही उन्होंने कानून में ही डाक्टरेट भी किया।

राजेंद्र प्रसाद पढ़ाई में भी अव्वल दर्जे के थे एक समय उनके शिक्षक ने कहा था कि लिखने वाला पढ़ानें वाले से भी ज्यादा अच्छा है।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद डाक्‍टर राष्‍ट्रपिता गांधी से बेहद प्रभावित थे, राजेंद्र प्रसाद को ब्रिटिश प्रशासन ने 1931 के ‘नमक सत्याग्रह’ और 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल में डाल दिया था।

राजेंद्र प्रसाद की बहन भगवती देवी का निधन 25 जनवरी 1950 को हो गया था। जबकि अगले दिन यानी 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने जा रहा था। ऐसे में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारतीय गणराज्य के स्थापना की रस्म के बाद ही दाह संस्कार में भाग लेने गए।जो यह साफ बताता है कि उन्हें अपने राष्ट्र से कितना प्रेम है और वह अपने राष्ट्र के लिए परिवार को भी छोड़ सकते है।

साल 1962 में राष्ट्रपति पोस्ट से हट जाने के बाद राजेंद्र प्रसाद को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया।

 बिहार के 1934 के भूकंप के समय राजेंद्र प्रसाद जेल में थे। जेल से छूटने के बाद वे भूकंप पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गए और उन्होंने वायसराय से तीन गुना ज्यादा धन जुटाया था।

राजेंद्र प्रसाद का निधन सदाकत आश्रम में 23 फरवरी 1963 में हुआ और जिसके बाद पूरा देश शोक की लहर में पहुंच गया था।

राजेंद्र प्रसाद एक शानदार नेता थे और वह हमेशा हर किसी को याद रहेंगे और उनकी याद में भारत के नेताओं को उनसे सीख लेनी चाहिये और उनके सिद्धांतों को फॉलों करना चाहिये।

 

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