Tuesday, April 16, 2019

देखें, चरणामृत लेते समय करें इस शुभ मंत्र का उच्चारण, जानें औषधीय महत्व…

आज एक बार फिर मै कुछ धर्मं एवं अध्यात्म से जुडी नयी पोस्ट की अपडेट लेकर आया हूँ, इस पोस्ट को अंत तक पढ़ते रहे ..

चरणामृत यानि चरणों का अमृत। हिन्दू धर्म में चरणामृत को बेहद शुद्ध और पवित्र माना जाता है। वैसे तो चरणामृत उस जल को कहा जाता है जिससे ईश्वर के पैर धोए जाते हैं और उसे अमृत के समान समझा जाता है। चरणामृत कच्चे दूध, दही, गंगाजल आदि से बना होता है। इसे आदर स्वरूप अपने माथे पर लगाकर ही इसे सेवन किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में लिखा है &#8211

पद पखारि जलुपान करि आपु सहित परिवार।

पितर पारु प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।

अर्थात &#8211 भगवान श्रीराम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया, बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।

लेकिन चरणामृत सिर्फ धार्मिक आस्था के अनुसार ही शुद्ध, पवित्र और लाभकारी नहीं है, बल्कि वास्तव में यह सेहत के लिए लाभकारी होता है। इसका उल्लेख शास्त्रों में भी मिलता है &#8211

पापव्याधिविनाशार्थं विष्णुपादोदकौषधम्।

तुलसीदलसम्मिश्रं जलं सर्षपमात्रकम्।।

अर्थात &#8211 पाप और रोग दूर करने के लिए भगवान का चरणामृत औषधि के समान है। यदि उसमें तुलसीपत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधिय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है।

चरणामृत सेवन करते समय निम्न श्लोक के उच्चारण करें &#8211

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।

विष्णुपादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।

अर्थात चरणामृत अकाल मृत्यु को दूर रखता है। सभी प्रकार की बीमारियों का नाश करता है। इसके सेवन से पुनर्जन्म नहीं होता। अत: चरणामृत को ग्रहण करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना अति शुभ माना गया है।

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