Friday, May 3, 2019

पुण्यतिथि विशेष: शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए डॉ ज़ाकिर हुसैन ने अपना पूरा जीवन कर दिया था समर्पित, जानिए उनके कुछ अनछुए पहलू

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8 फ़रवरी 1897 को जन्में डॉ ज़ाकिर हुसैन, एक ऐसी महान और मजबूत शख्सियत हैं, जिन्होंने भारत में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने के मकसद से अपना अधिकांश जीवन शिक्षा को ही समर्पित कर दिया। साल 1954 में पदम्विभूषण और 1963 में भारत का सबसे बड़ा सम्मान भारत रत्न हासिल कर चुके हुसैन ने साल 1967 में देश के तीसरे राष्ट्रपति बनने के साथ ही पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया लेकिन एक शिक्षक से लेकर राष्ट्रपति बनने तक का सफ़र डॉ हुसैन के लिए कांटो पर चलने के समान रहा था, पहाड़ पर चढ़ने के बराबर इस सफ़र में उनकी योग्यता और प्रतिभा के साथ साथ उनके परिश्रम और ढृढ निश्चय ने भी अहम भूमिका अदा की थी।

इस सुनहरे सफ़र की शुरूआत हैदराबाद में उनके एक शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न और सुम्भ्रांत परिवार में जन्म लेने से हुई, जन्म के बाद ही हुसैन के माता-पिता, उन्हें सहपरिवार उत्तर प्रदेश में लाकर बस गए। सात भाईयों में से एक भाई ज़ाकिर बचपन से ही अनुशासनप्रिय व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। स्वभाव से सरल और विनम्र जाकिर को शिक्षा के प्रति लगाव अपने पिता फिदा हुसैन खान से विरासत में मिला था, जिस लगाव के चलते जाकिर भारत में शिक्षा को एक अलग ही स्तर पर लेकर जाने में कामयाब रहे।

पत्थरों से भरी ये राह शुरूआत में ही उनके लिए दुखदायी साबित हुई, महज़ 10 वर्ष की आयु में उनके सर से पिता का साया छिन जाने के 3 साल बाद ही साल 1911 में उनकी माता नाज़निन बेगम भी प्लेग नाम की बीमारी के चलते चल बसी। बावजूद इसके हुसैन के मजबूत इरादों ने उन्हें कभी हार नही मानने दी और माता-पिता के नक्षे कदमों पर चलते हुए उन्होंने अपनी पढाई जारी रखी और प्रारंभिक शिक्षा इटावा के इस्लामिया हाई स्कूल से हासिल करने के बाद, ऐंग्लो- मुस्लिम ऑरियेंटल कॉलेज से कानून के विषय में MA किया।

भारत में शिक्षा को एक अलग मुकाम पर देखने के अपने इस सपने को हकीकत में बदलने की शुरूआत जाकिर ने वर्ष 1920  में कुछ छात्रों और शिक्षकों के एक छोटे समूह का नेतृत्व करके की। जिसके बाद उन्होंने उसी साल अक्टूबर में अलीगढ़ शहर में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की। जिसे 5 साल बाद करोल बाग में स्थानांतरित करने के बाद साल 1935 में उन्होंने अंत में नई दिल्ली के जामिया नगर में स्थानांतरित कर दिया। जिसके फलस्वरूप इसे जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के रूप में पुनः नाम दिया गया।

साल 1920 से 1922 तक के उस समय में जाकिर ने इसी विश्वविद्यालय में एक शिक्षक की भी अहम भूमिका निभाई। जिसके बाद प्रतिभाशाली छात्र हुसैन की शिक्षा में गहरी रुचि फिर से लागू होने पर वो साल 1926 में बर्लिन के फ्रेडरिक विलियम यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के विषय में पीएचडी हासिल करने के लिए जर्मनी रवाना हो गए और शिक्षित तौर पर संपन्न होने के साथ वो एक कुशल वक्ता के रूप में भी उभर कर आए। जर्मनी से जाकिर , सबसे महान उर्दू कवि मिर्ज़ा असदुल्ला खान ‘ग़ालिब’ के सर्वश्रेष्ठ कार्यों के संग्रह के साथ आए थे।

वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपना पूरा समय जामिया विश्वविद्यालय के सुधार और विकास को ही दिया, जो उस समय बंद होने की कगार पर था, लेकिन जाकिर हुसैन के आशावादी व्यक्तित्व ने ऐसा होने से बचाने के लिए जामिया का पूर्ण संचालन का भार अपने कंधो पर अगले 20 वर्षो तक उठा लिया स्वतंत्रता के बाद इसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनने के बाद उन्होनें न ही सिर्फ भारत में बल्कि विदेशो में भी जामिया को एक अलग ही पहचान दिला दी। हुसैन के इस सफर में अलीगढ यूनिवर्सिटी को भी उनकी सेवाएं लेने का मौका मिला, वो इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।

साल 1937  में, जब कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर सफलतापूर्वक अंतरिम सरकार बनाई, तब एक राष्ट्रीय शैक्षिक सभा को शिक्षा की राष्ट्रीय नीति स्थापित करने के लिए बुलाया गया था, जहां महात्मा गांधी के साथ उन्होंने पुस्तक-केन्द्रित शिक्षा के बजाय एक कार्य-केंद्रित शिक्षा का समर्थन किया था लेकिन उसके बाद साल 1948 में उनके राजनीतिक सफ़र की शुरूआत तब हुई, जब पंडित नेहरू ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया. इसके बाद तो उन्होंने सियासत में कभी पीछे मुड़कर नही देखा.

साल 1955 से 1957 तक जिनेवा के सभापति से लेकर 1956 में ही राज्यसभा के अध्यक्ष और संसद के सदस्य बनने वाले जाकिर हुसैन साल 1957 में बिहार के गवर्नर नियुक्त होने के लिए राज्यसभा की सदस्यता तक भी त्याग दी। साल 1962 में उन्हें उपराष्ट्रपति बनने के अवसर मिलने के साथ ही उन्होंने देश के हित में कार्य करने को सर्वोप्रिय रखा, जिसके बाद साल 13 मई 1967 का वो ऐतिहासिक दिन था.

जब इंदिरा गांधी की सरकार में उन्होनें देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बनकर इतिहास रच दिया। उनका एक भाषण, आज भी लोगो के दिलों में बसा हुआ हैं, उन्होंने कहा था कि भारत उनका घर हैं, और यहां सभी उनके भाई बहन हैं। डॉ जाकिर हुसैन ने देश में शिक्षा के स्तर को बढाने के लिए यू तो कई कार्य किए, लेकिन अपने सिद्धांतो का पालन करते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग को गठित किया, जिसे उन्होंने अपना कर्तव्य समझा।

डॉ जाकिर हुसैन के मजबूत हौसलों वाली शख्सियत के कई प्रेमी थी, लेकिन प्रेमी तो वो खुद भी साहित्य और कला के थे, जिन्होनें स्नेह और प्रेम से बहुत सी किताबों की रचना की, जिनमें शहीद की अम्मा, रिपब्लिक, अंधा घोड़ा, ए फ्लेवर सोंग उनकी मुख्य रचनाएं रही। आज से ठीक 50 साल पहले यानि 3 मई 1969, जी हां यही वो काला दिन था जिस दिन भारत ने इस महान पुरूष को आखिरी विदाई दी।

अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल के महज 2 वर्षो के भीतर ही उन्होनें अपने ऑफ़िस में प्राण त्याग दिए। यू तो डॉ जाकिर हुसैन ने अपने जीवन में कई इतिहास के पन्ने पलटकर, सुनहरे अक्षरो में नए नए कीर्तिमान लिख डाले थे, लेकिन ऑफिस में दम तोड़ने वाले भारत के पहले राष्ट्रपति बनकर उनकी आखिरी सासो ने भी इतिहास में नाम दर्ज करा डाला।

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, जिसे अपने जीवन का बहुमूल्य समय उन्होने समर्पित किया, उसी के परिसर में उनके पार्थिव शरीर को दफनाया गया था। जाकिर आज भी हर उस छात्र के दिल में सास लेते हैं, जो पढ-लिखकर कुछ बनने का सपना देखता हैं। हर उस किताब के पन्नों मे उनका नाम सुनहरी स्याही से दर्ज हैं, जो करोड़ो लोगों को शिक्षा प्रदान करती हैं। सलाम हैं ऐसे विद्वान महापुरूष को, जो शिक्षा और विकास के क्षेत्र में भारत का नक्षा बदलकर अपनी एक अलग ही छाप छोड़ गए।

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