Tuesday, August 13, 2019

फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने मुझे ‘पीने’ की लत लगा दी !

महान काटरूनिस्ट और साहित्यकार आबिद सुरती से मिलकर आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते। इस उम्र में भी उनकी चपलता, खिलंदड़ापन, मजाकिया स्वभाव और तेजी देखते बनती है। आबिद सुरती का जन्म 1935 में सौराष्ट्र (अब गुजरात) के वावेरा में हुआ था। सिर्फ एस.एस.सी तक की पढ़ाई कर इस दुनिया में अपनी अमिट अलहदा छाप छोड़ने वाले आबिद जी का साहित्य सौ से भी अधिक किताबों में मौजूद है, जिनमें 50 उपन्यास, दस कहानी संकलन, 7 नाटक, 25 बच्चों की पुस्तकें, एक यात्रा वृतांत, एक गजल संकलन, एक संस्मरण और ढेर सारे कॉमिक्स हैं। प्रमुख कृतियां इस प्रकार हैं- गिजुभाई का गुलदस्ता- 10 भाग (हिन्दी, पंजाबी, ओडिया और गुजराती भाषाओं में), बूंदाबांदी (श्रेष्ठ व्यंग्य कथाएं), ढब्बूजी की धमक (कॉमिक्स), अक्ल बड़ी या ढब्बू जी, मेरे पापा की शादी (व्यंग्य उपन्यास), 365 ढब्बूजी के चुटकुले, नवाब रंगीले (बाल उपन्यास), बहत्तर साल का बच्चा (बाल उपन्यास), बोल बुद्धू (कॉमिक्स), डाँ. चिंचू के कारनामे (कॉमिक्स), बुद्ध क्यों मुस्कराए। उनका ढब्बूजी व्यंग्य चित्र-पट्टी 30 साल तक निरंतर साप्ताहिक धर्मयुग में प्रकाशित हुआ। आधा दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से सम्मानित आबिद सुरती ने मुम्बई को अपनी कर्मभूमि बना रखी है। प्रस्तुत है आबिद सुरती से पॉलिटिकल एडिटर संजय सिंह की बातचीत के प्रमुख अंश- 

आबिद

संजय सिह : अपने शुरुआती जीवन के बारे में कुछ बतायें।

आबिद सुरती – देश के विभाजन से पहले हमारा परिवार सूरत शहर में था। वहीं पर मेरा जन्म वर्ष 1935 में हुआ था। सन् 42 तक वहां रहे। मेरे परिवार पर पहला हादसा मेरी पैदाइश के बाद हुआ था, जब हम करोड़पति से सड़क पर आ गये थे। मेरे दादा का शिपिंग का कारोबार था। एक के बाद एक जहाज डूबने लगे और हम हवेली से फुटपाथ पर आ गये। उस समय दुनिया में द्वितीय वि युद्ध छिड़ा हुआ था। हमारा पूरा कुनबा माइग्रेट करके बाम्बे (अब मुम्बई) आ गया। देश उस समय विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था। पूरी फिंजा में यह बात फैली हुयी थी कि भारत हिन्दू का है और पाकिस्तान मुसलमान का। मुसलमान लोग यहां से जा रहे थे। पर मेरी दादी नेशनलिस्ट थीं और गाँधी के साथ जुड़ी थीं। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के बीच चरखा मूवमेंट शुरू किया था। दादी की जिन्दगी की कमाई यही थी। स्वतंत्रता आन्दोलन में एक बार जब डाँडी कूच के लिए गाँधी जी चले तो सुबह 4-5 बजे सूरत से गुजरने वाले थे। उन्हें देखने और स्वागत करने के लिए रात-रात भर लोग जागे। दादी भी खड़ी थीं1 दादी ने कहा कि गांधी तो चल रहे थे, लेकिन लोग पीछे-पीछे दौड़ रहे थे (गाँधी जी बहुत तेज चलते थे)। सारे हिंदुओं के दौड़ में एक मुस्लिम महिला खड़ी थी। उनको ब्रेक लग गया। गाँधी जी आये और 10 सेकंड तक हाथ जोड़े खड़े रहे।

बहरहाल..मेरा जो कुनबा सूरत से मुम्बई आया पाकिस्तान जाने के लिए, दादी ने कहा कि मैं इस माटी में मरूंगी। दादी रुकीं तो हम दस लोग रुक गये। पर 20-25 लोग चले गये। मुम्बई में हमारा अपना कोई घर तो था नहीं। किराये पर एक छोटा कमरा था। कुछ लोग अन्दर सोते थे, बाकी हम फुटपाथ पर सोते थे। उस वक्त मेरी उम्र सात साल थी। पैसे तो थे नहीं। मम्मी करोड़पति की बहू थीं, लेकिन वक्त की मार देखिये कि घर-घर पड़ोस में बर्तन माजती थीं। उन्होंने एक काम किया कि पैसे जोड़कर मुझे स्कूल भेजा। कक्षा दस तक पढ़ाया। बोलीं की अगर आगे पढ़ना है तो खुद काम करो।

जब हम फुटपाथ पर थे, तो हम लोग यानि कि छह सात बच्चों का गैंग भीख मांगने निकल जाता था। डाकयार्ड में एक ट्रेन रुकती थी, दरअसल वो द्वितीय वि युद्ध की सैनिक ट्रेन होती थी जो वीटी स्टेशन तक जाती थी। बहुत स्लो चलती थी। उसमें यूके और यूएस के सैनिक होते थे। हम उनसे डालर और ब्रेड मांगते थे। एक दिन एक सैनिक ने भीख में एक कामिक्स फेंक दी। उस पर भी हम सब झपट पड़े। मेरे हाथ में एक पन्ना आया। पन्ना देखकर लगा कि इसे तो मैं भी बना सकता हूं। नकल कर 100 के करीब काटरून बना डाला। और यहां से मैं काटरूनिस्ट बन गया स्कूल डेज में। सारे बूढ़े मेरे फ्रेंड थे। आज जो मेरे फ्रेंड हैं सभी टीन एजर हैं। बूढ़े मेरे काटरून की तारीफ करते थे पर उसे मैं कहां बेचूं यह समझ में नहीं आ रहा था।

पाकेट काटरून लक्ष्मन से पहले मैंने बनाया। तब मैं स्काउट में था। साल में एक दिन ’खरी कमाई डे’ मनाया जाता था। उस डे में होता यह था कि सभी स्काउट वाले अपनी मेहनत की कमाई ही खायेंगे। वह शायद 1952-53 का वक्त रहा होगा। कोई फ्लावर बनाता था तो कोई शू पालिस करता था। मुझे अपना कार्टून बेचने का ख्याल आया। टाइम्स आफ इंडिया अखबार के दफ्तर में काटरून बेचने के लिए गया। केबिन में धक्का मारकर घुस गया। जल्दी से अपने कार्टून्स को एडीटर के टेबल पर रख दिया। एडीटर देखकर मुस्कराये। उन्हें काटरून पसन्द आया। इस तरह मेरा पहला काटरून टाइम्स आफ इंडिया (टीओआई) में छपा। बेसिकली आई एम ए पेंटर। पेंटर सर्विस करने के लिए कार्टून और राइटिंग भी करना पड़ा।

संजय सिह : एक वक्त था, जब धर्मयुग नामक साप्ताहिक पत्रिका अपने लोकप्रियता के चरम पर थी और उसमें आपका काटरून कोना ढब्बू जी तो इतना लोकप्रिय था कि पत्रिका को लोग पीछे से पढ़ना शुरू करते थे। क्यों कि ढब्बू जी सबसे पीछे वाले पेज पर छपते थे ! ढब्बू जी काटरून के बारे में कुछ बतायें।

आबिद सुरती – ढब्बू जी को मैंने ओरिजनली गुजराती में शुरू किया। वीकली पत्रिका ‘चेत मछन्दर (नाथ सम्प्रदाय के गुरू गोरखनाथ से संबंधित) में फ्री लान्सिंग शुरू किया। तो निगेटिव मैसेज आने लगे। सम्पादक ने कहा कि बन्द करो। मैंने कहा दो-तीन माह तो देखो। पर दूसरे माह और गाली आने लगी। उसी समय बच्चों की पराग पत्रिका में डा. चिन्चू के चमत्कार बनाता था। वो पापुलर हो गया। डा. धर्मवीर भारती उस वक्त धर्मयुग पत्रिका के सम्पादक बन कर आये। तो उन्होंने कार्टून के लिए बड़े-बड़े नाम ट्राई किये। सब फेल हो गये। मुझे जब बुलावा आया, तो तीन माह का गुजराती वाला कार्टून लिपि बदलकर उन्हें दे दिया। धर्मयुग में एक माह में ही वह कार्टन (कार्टून कोना- ढब्बू जी) चल पड़ा। आश्चर्य यह गुजराती में मिटा और हिन्दी में चल पड़ा। 30 साल नान स्टाप चला- मल्टीलिन्गुअल।

संजय सिह : आपने एक बार बातचीत में मुझसे कहा था कि फिल्म स्टार धर्मेंद्र ने आपको शराब की लत लगाई ! आखिर वह कैसे ? जरा तफ़सील से बताइये।

आबिद सुरती – अम्मी ने कहा था कि आगे पढ़ाई करनी है तो कमाई का खुद का जरिया बनाना होगा। दोस्त ने फिल्म लाइन की सलाह दी। फिल्म स्टूडियो में स्पाट ब्वाय बन गया। धर्मेंद्र उस समय नया-नया आया हुआ था। उसमें (धर्मेंद्र) एक खूबी- रिलेशनशिप स्टैबलिश करने की थी। आगरा में होटल क्लार्क सिराज का ओपेनिंग हुआ- धर्मेंद्र और मैं करीब आ गये थे। पीने के लिए उसके कमरे में आ जाते थे। मैं पीता नहीं था, बल्कि पीने की आदत उसने डाली। आगरा में फिल्म बेगाना की शूटिंग में हम एक माह साथ थे। तब से लत लगा दी। वहीं से आदत बनी। लेकिन एल्कोहलिक मैं कभी नहीं बना। फिर फिल्म निर्माता-निर्देशक राजखोसला मिला, उसने यह आदत और गहरी कर दी। उसके लिए मैं फिल्म स्क्रिप्ट लिख रहा था। नाम था ‘नकाब’। फिल्म रिलीज हुई और हिट हुई। वह (राजखोसला) एक खूबसूरत कैरेक्टर था। बोतल निकाल ली। मैंने कहा सनसेट के पहले नहीं लूंगा (शराब नहीं पिऊंगा)। मेरे इतना कहते ही राज ने कमरे के सारे पर्दे लगा दिए और बोला, ‘‘लो..सनसेट कर दिया’’। और फिर जेब से दूसरी बोतल भी निकाल ली। राजकपूर, देवानन्द, राजखोसला के साथ भी मैंने काम किया।

संजय सिह : आप काटरूनिस्ट हैं…चित्रकार हैं। आप कथाकार, उपन्यासकार, कवि और नाटककार भी हैं। आप एक एक्टिविस्ट भी हैं। पानी की एक-एक बूंद बचाने के लिए जनता को जागरूक करने की आपकी मुहिम रंग ला रही है। इतनी सारी विधाओं में आप एक साथ काम कैसे कर लेते हैं ?

आबिद सुरती – दिमाग की सेटिंग अगर आप कर लो तो सारी विधाओं पर आप काम कर सकते हैं। दिमाग के दराज में सब कुछ है। जो चाहा वो दराज खोल लिया। उपन्यास लिखने का मन किया तो वही दराज खुला। और एक माह तो वह चलेगा। मोबाइल आने के बाद कम कर दिया लिखना। एक साल में 10 उपन्यास लिखता था। अब एक ही हो जाये बहुत है।

संजय सिह : इन दिनों क्या नया लिख रहे हैं ?

आबिद सुरती – अभी मैंने एक नाटक कम्पलीट किया है। ‘मिस्टर एंड मिसेज ब्रह्मचारी। कंडोम के साथ इसका विज्ञापन डाला है सोशल साइट्स पर। पांच जुबानों में थियेटर ग्रुप आ गया। मैंने आनलाइन बेच दिया।

संजय सिह : पानी की एक-एक बूंद बचाने के लिए जनता को जागरूक करने के लिए जो आपने ‘ड्राप डेड फाउन्डेशन’ बनायी है, उसके बारे में कुछ बतायें ?

आबिद सुरती – ‘ड्राप डेड फाउन्डेशन’ वन मैन एन्जियो है। एन्जियो का मतलब आफिस, तामझाम, स्टाफ। पर मैं अकेले करता हूं। ये उन पर थप्पड़ है। मुझे एसी कमरा नहीं चाहिये। मेरे दिमाग में इस कार्य की सोच बचपन से ही थी। पानी की किल्लत हमनें बचपन से झेली है। एक-एक बाल्टी पानी के लिए लड़ाई हुई है। ‘वन ड्राप सिनेमा’  नामक एक कम्पटीशन एनाउंस किया था फेसबुक पेज पर। एक मिनट की फिल्म पानी बचाओ आन्दोलन पर। इस पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय ईनाम भी रखा। जो क्रमश: एक लाख, 50 हजार और 25 हजार का था। जजेज में जूही चावला भी थीं। 100 के आसपास इंट्रीज आयीं। जूही ने पांच हजार के पांच-पांच ईनाम इम्प्रेस होकर एनाउंस कर दिया।

संजय सिह : इस आन्दोलन के तहत आप क्या करते हैं, कैसे लोगों को जागरूक करते हैं ?

आबिद सुरती – प्रत्येक सोमवार के दिन मुम्बई में किसी एक बिल्डिंग को टाग्रेट करते हैं। सोसाइटी सेक्रेटरी से अनुमति लेकर सभी घरों के नलों को चेक करते हैं और जिसमें पानी टपकता मिलता है उसे ठीक करते हैं। यह कार्य मैं खुद करता हूं। टाग्रेट किये गये बिल्डिंग या सोसाइटी के घरों में शनिवार को ही पानी की बूंद बचाने से संबंधित लिटरेचर वाला फोल्डर भेज देता हूं। उसके पहले पोस्टर भी लगाते हैं। लोग हमारे बारे में जान चुके हैं कि मैं कोई पालिटिकल व्यक्ति नहीं हूं। शुरू में दोस्त लोगों के नल ठीक कर देता था और अब तो यह एक आन्दोलन का रूप ले चुका है। 

संजय सिह : बहुत कुछ आप करते रहते हैं ! क्या कुछ बाकी रह गया है ?

आबिद सुरती – एक प्रोजेक्ट लांच किया है अभी जो मरते दम तक चलेगा- ‘सेव वाटर : सेव र्वल्ड’। मैं चाहता हूं कि कम से कम 10 फीसद लोगों को यह बात समझ में आये। अभी तो एक फीसद को ही आती है। इसलिये मैंने इसे धर्म से जोड़ा है। उसके लिए पोस्टर बना रहा हूं। पोस्टर में पैगम्बर मोहम्मद साहब के उस कोटेशन का जिक्र किया हूं, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘नहर के किनारे भी बैठे हैं तो एक बूंद पानी भी जाया नहीं करना है। सारे मस्जिदों में पोस्टर लगा दिया। दुनिया भर में एक बिलियन मस्जिद, मन्दिर, चच्रेज और गुरुद्वारों को कवर करने का लक्ष्य है। हिन्दू लोगों के लिए अलग पोस्टर बना रहा हूं, जिसमें गणोश भगवान कह रहे हैं कि पानी नहीं होगा तो हमारा विसर्जन कहां होगा।

संजय सिह : आपने पिछले सालो आई एक फीचर फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ के निर्माता पर कोर्ट केस किया था। उसके पीछे क्या वजह थी ?

आबिद सुरती -‘अतिथि तुब कब जाओगे’- मेरे उपन्यास ‘72 साल का बच्चा’ को चुराकर बनायी गयी है। कोर्ट में केस चल रहा है तीन साल से।

संजय सिह : इस उम्र में भी आप इतने स्वस्थ, चुस्त-दुरुस्त और फुर्तीले हैं। हमारी यही कामना है कि आप दीर्घायु हों और बराबर स्वस्थ बने रहें। लेकिन इसका राज बताइये कि आप अभी भी जवान कैसे बने हुए हैं ?

आबिद सुरती – (हंसते हुए) बचपन में मेरे सारे दोस्त बुजुर्ग लोग थे। इस उम्र में टीन एजर हमारे दोस्त हैं। उनसे इनर्जी प्राप्त करता हूं। ‘हंस’ पत्रिका में मेरी कहानी ‘कोरा कैनवास’ छपी थी जो मेरी ट्रू लाइफ पर थी। उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि मेरे अन्दर अभी भी एक बच्चा ही है।

    अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान यह पहली बार हुआ था जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में संवादताताओं से रूबरू हुए ।…

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