Sunday, August 18, 2019

जानें, कैंसर के इस प्रकार के बारे में जिसमें बच पाना होता है बेहद मुश्किल

बीमारी कोई भी हो अगर वक़्त पर इलाज न किया जाए तो ज़िन्दगी खतरे में पड़ जाती है। वैज्ञानिकों ने पैंक्रियाटिक (अग्नाशय) कैंसर के इलाज की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने इसकी नई दवा ईजाद की है और शुरुआती प्रयोगों में इसे काफी कारगर पाया गया है।

अग्नाशय के कैंसर का इलाज रेडिएशन और कीमोथेरेपी के जरिये किया जाता है। दोनों ही तरीकों में कैंसर के डीएनए को नुकसान पहुंचाया जाता है। हालांकि अग्नाशय के कैंसर में इस नुकसान को सही करने की क्षमता भी होती है। इस वजह से इलाज का असर सीमित हो जाता है।

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका वक़्त पर पता नहीं चले तो मरीज़ का बच पाना मुश्किल हो जाता है। अब वैज्ञानिकों ने पाया है कि दवा एजेडडी 1775 की मदद से डीएनए की मरम्मत करने की कैंसर की क्षमता को खत्म किया जा सकता है। रेडिएशन और कीमोथेरेपी के साथ मरीजों को यह दवा देने से इलाज का असर बढ़ जाता है। आमतौर पर अग्नाशय के कैंसर का शिकार होने के बाद महज नौ प्रतिशत मरीज ही पांच साल से ज्यादा जीवित रह पाते हैं।

पैंक्रियाटिक कैंसर

पैंक्रियाटिक कैंसर बेहद गंभीर रोग है। इसे कैंसर का ही एक प्रकार माना जाता है। जानकारी के लिए बता दें कि अग्‍नाशय में कैंसर युक्‍त कोशिकाओं के जन्‍म के कारण पैंक्रियाटिक कैंसर की शुरूआत होती है। यह ज़्यादातर 60 वर्ष से ऊपर की उम्र वाले लोगों में पाया जाता है।

जैसे जैसे उम्र बढ़ती है तो उसके साथ ही हमारे डीएनए में कैंसर पैदा करने वाले बदलाव होते हैं। इसी कारण 60 वर्ष या इससे ज्‍यादा उम्र के लोगों में पैंक्रियाटिक कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। इस कैंसर के होने की औसतन उम्र 72 साल है।

लक्षण : पैंक्रियाटिक कैंसर को ‘मूक कैंसर’ भी कहा जाता है। इसे मूक कैंसर इसलिए कहा जाता है क्‍योंकि इसके लक्षण छिपे हुए होते हैं और आसानी से नजर नहीं आते।

पैंक्रियाटिक कैंसर

महिलाओं के मुकाबले पैंक्रियाटिक कैंसर के शिकार पुरुष ज्‍यादा होते हैं। पुरुषों के धूम्रपान करने के कारण इसके होने का ज्‍यादा खतरा रहता है। धूम्रपान करने वालों में अग्‍नाशय कैंसर के होने का खतरा दो से तीन गुने तक बढ़ जाता है। रेड मीट और चर्बी युक्‍त आहार का सेवन करने वालों को भी पैंक्रियाटिक कैंसर होने की आशंका बनी रहती है। कई अध्‍ययनों से यह भी साफ हुआ है कि फलों और सब्जियों के सेवन से इसके होने की आशंका कम होती है।

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