Monday, October 7, 2019

#Dussehra 2019: भारत के इस राज्य में दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए भेजा जाता है देवी देवताओं को आमंत्रण

हिन्दू धर्म में लोग त्योहारों को बड़ी शिद्दत से इंतजार करते है। उनमे से एक है दुर्गा पूजा व् दशहरा भी, जिसे पुरे देशभर में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। एक ओर मां दुर्गा के नव रूपों का पूजा किया जाता है, तो दूसरी ओर रावण का पुतला जलाकर अच्छाई की बुराई पर जीत के जश्न को बड़ी हर्षों उल्लास के साथ मनाया जाता है। ऐसा ही एक जश्न छत्तीसगढ़ में बस्तर के एक तहसीलदार द्वारा बस्तर दशहरा में भाग लेने के लिए समस्त ग्रामों के देवी देवताओं को दशहरा में शामिल होने की आमंत्रण भेजा जाता है। जिसमें 6166 ग्रामीण प्रतिनिधि बस्तर दशहरे की पूजा विधान को संपन्न कराने के लिए विशेष तौर पर बढ़ -चढ़कर हिस्सा लेते है।

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आपको बता दें कि पंचमी तिथि को विशेष तौर पर बस्तर के राजपरिवार के द्वारा दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी मंदिर में पूजा अनुष्ठान के साथ मावली परघाव पूजा विधान में शामिल होने के लिए मावली माता सहित समस्त देवी देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। वहीं इसके साथ ही बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में देवी देवताओं के आस्था का महाकुंभ में शामिल होने के लिए बस्तर संभग सहित बस्तर से लगे अन्य प्रदेशों के देवी देवताओं सहित सभी ग्रामों के देवी देवता को लेकर ग्रामीण बस्तर दशहरा में शामिल होते हैं।

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बस्तर दशहरे पर आमंत्रित देवी-देवताओं की संया को देखते हुए कहा जा सकता है कि, यह पर्व बस्तर के वनवासी जनजातियों की आस्था का महाकुुंभ हैं। बता दें कि बस्तर राजवंश की कुल देवी दंतेश्वरी के विभिन्न रूप इस पर्व पर नजर आते हैं, राज परिवार की कुलदेवी दंतेश्वरी के बस्तर में स्थापित होने के बाद यहां कई ग्रामों की देवी को दंतेश्वरी के रूप में पूजी जाती है।

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बस्तर की स्थानीय मूल देवी मावली माता को माना जाता है। यही वजह है कि बस्तर दशहरा का सबसे आकर्षण का केंद्र मावली परघाव पूजा विधान के रूप में देखने को मिलता है। बस्तर दशहरे में दंतेवाड़ा से यहां पहुंचने वाली मावली माता की डोली मणिकेश्वरी के नाम पर दंतेवाड़ा में देखने को मिलती है। क्षेत्र और परगने की विशिष्टता एवं परपरा के आधार पर मावली माता के एक से अधिक संबोधन देखने-सुनने को मिल जाते हैं। जैसे घाट मावली &#8216जगदलपुर&#8217, मुदरा &#8216बेलोद&#8217, खांडीमावली &#8216केशरपाल, कुंवारी मावली &#8216हाटगांव और मोरके मावली &#8216चित्रकोट है।

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वहीं बस्तर में रियासत काल से देवी-देवताओं को दशहरा पर्व पर आमंत्रित करने की परपरा आज भी जारी है। माई दंतेश्वरी सोनारपाल, धौड़ाई नलपावंड, कोपरामाडपाल, फूलपदर, बामनी, सांकरा, नगरी, नेतानार, सामपुर, बड़े तथा छोटे डोंगर , मावली माता की स्थापना माड़पाल, मारकेल, जड़ीगुड़ा, बदरेंगा, बड़ेमारें, मुण्डागांव और चित्रकोट में हैं। इसी तरह हिंगलाजिन माता की स्थापना विश्रामपुरी, बजावंड, कैकागढ़, बिरिकींगपाल, बनियागांव भंडारवाही और पाहुरबेल में है। इसी तरह कंकालीन माता जलनी माता की भी स्थापना बस्तर के विभिन्न गांवों में है।

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देवी-देवताओं को उनकी शक्ति, पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप दिये गये समान में भैरमदेव को सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है। भैरम के और भी रूप जद भैरम, बूढ़ा भैरम और पीला भैरम मिलते हैं। घोड़ावीर, कालवाम, गायतादेव, सिंगदेव, जांगड़ादेव तथा भीमादेव भी पूजे जाते हैं।

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अपनी तमाम खूबियों के बीच कई टन वजनी दो मंजिला विशालकाय रथ की परिक्रमा पर्व का खास आकर्षण है, जिसे अपने कैमरे मेें कैद करने देशी-विदेशी पर्यटकों में होड़ लगी रहती है। वहीं रथ परिक्रमा पूजा विधान में कई देवी-देवताओं के आह्वान के साथ अग्रसर होता है। बेल पूजा विधान के तहत ग्राम सरगीपाल से जोड़ा बेल लाकर दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किया जाता है। जोड़ा बेल की स्थापना को मणिकेश्वरी और दंतेश्वरी की स्थापना के रूप में परंपरा का निर्वहन किया जाता है। इसके पश्चात महाष्टमी पूजा विधान निशा जात्रा पूजा विधान, मावली परघाव पूजा विधान, भीतर रैनी, बाहर रैनी पूजा विधान, काछन जात्रा पूजा विधान, कुटुंब जात्रा पूजा विधान, के साथ ही मावली माता की विदाई पूजा विधान के साथ बस्तर दशहरा अपनी संपन्नता के साथ अगले वर्ष के लिए परायण होता है।

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