Saturday, May 16, 2020

दिव्यांग बच्चे को घर ले जाने के लिए चोरी की साइकिल, चिट्ठी छोड़कर मालिक से बोला- माफ करना, मैं मजदूर हूं, मजबूर भी!..

आज एक बार फिर मै खान पान से जुडी कुछ जरुरी बातों के साथ ये नयी पोस्ट लेकर आया हूँ, इस पोस्ट को आखिरी तक पढ़ते रहे ..

सूरत: कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच प्रवासी कामगारों और मजदूरों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। लॉकडाउन में जब सब काम धाम ठप पड़ा है ऐसे में उनके सामने अपनी नौकरी, आय और आजीविका और सुरक्षित जीवन खोने का डर सताने लगा है। यहां तक कि कुछ खुद और परिवार को सुरक्षित घर पहुंचाने के लिए अपराध भी करने के लिए मजबूर हो गए हैं। ऐसा एक मामला सामने आया है। ऐसी ही एक स्टोरी बरेली के रहने वाले मोहम्मद इकबाल की है जो सामने आई है।

दरअसल, इकबाल को भरतपुर से बरेली आना था, उनके साथ उनका दिव्यांग बच्चा भी साथ में था। ऐसे में इकबाल तो पैदल चल लेते लेकिन बच्चा कैसे चलता। इसके लिए इकबाल ने रारह गांव से सोमवार देर रात साहब सिंह के घर से एक साइकिल चुराई।
साइकिल चुराते वक्त इकबाल ने वहां एक पत्र छोड़ आया। साहब सिंह सुबह जब अपने बरामदे में झाड़ू लगा रहे थे कि तभी उन्होंने वह पत्र पाया।

इकबाल को उस पत्र का एक फोटो मिला। जिसमें इकबाल ने लिखा है &#8216मैं मजदूर हूं मजबूर भी। मैं आपका गुनेहगार हूं। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना। मुझे बरेली तक जाना है, मेरे पास कोई साधन नहीं है और विकलांग बच्चा है। रारह एक ग्राम पंचायत है जो कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा पर पड़ता है। लॉकडाउन के बाद हजारों की संख्या में प्रवासी श्रमिक उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड आदि राज्यों के लिए निकल पड़े हैं। समाजसेवा करने वाले राजीव गुप्ता कहते हैं कि यह घटना मजदूरों की बेबसी और सरकारों की विफलता को दर्शाती है।

लॉकडाउन लगाने से पहले, सरकारों को उनके लिए परिवहन की व्यवस्था करनी चाहिए थी ताकि वे अपने मूल स्थानों तक पहुंच सके, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई मजदूरों कई दिनों से भूखे हैं, न उनको खान मिल रहा है और न ही वो अपने परिवार को खिला पा रहे हैं।

Dailyhunt

Disclaimer: This story is auto-aggregated a computer program and has not been created or edited Dailyhunt. Publisher: Pardaphash Hindi

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