Friday, May 22, 2020

vat savitri pooja 2020: कोरोना संकट में कैसा होगा वट सावित्रि व्रत…जानिए विधि



व्रत, धर्म का साधन माना गया है. संसार के विभिन्न धर्मों ने किसी न किसी रूप में व्रत और उपवास को अपनाया है. व्रत के आचरण से पापों का नाश, पुण्य का उदय, शरीर और मन की शुद्धि की प्राप्ति और शांति और परम पुरुषार्थ की सिद्धि होती है.

इसी तरह से वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिन्दू धर्म को मानने वाली स्त्रियों के लिए बेहद खास है. मान्यता है कि इस व्रत को रखने से पति पर आए संकट चले जाते हैं और आयु लंबी हो जाती है. यही नहीं अगर दांपत्य जीवन में कोई परेशानी चल रही हो तो वह भी इस व्रत के प्रताप से दूर हो जाते हैं. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए इस दिन वट यानी कि बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं.

पूजा की विधि

– महिलाएं सुबह उठकर स्नान कर नए वस्त्र पहनें और सोलह श्रृंगार करें.
– अब निर्जला व्रत का संकल्प लें और घर के मंदिर में पूजन करें.
– अब 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) और 24 पूरियां अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष पूजन के लिए जाएं.
– अब 12 पूरियां और 12 बरगद फल वट वृक्ष पर चढ़ा दें.
– इसके बाद वट वृक्ष पर एक लोट जल चढ़ाएं.
– फिर वट वक्ष को हल्दी , रोली और अक्षत लगाएं.
– अब फल और मिठाई अर्पित करें.
– इसके बाद धूप-दीप से पूजन करें.
– अब वट वृक्ष में कच्चे सूत को लपटते हुए 12 बार परिक्रमा करें.
– हर परिक्रमा पर एक भीगा हुआ चना चढ़ाते जाएं.
– परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्य वान व सावित्री की कथा सुनें.

इस तरह से करें पूजा
इस बार कोरोना संकट को लेकर देश भर में लागू लॉकडाउन के कारण महिलाएं बरगद के पेड़ के पास इकट्ठा नहीं हो सकेंगी. इस दौरान बरगद के टहनी अपने घर लाकर पूजा करनी होगी. जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार अथवा यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करें. बरगद के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें.

फिर बांस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें. बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगायें. भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सास  के चरण-स्पर्श करें. यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं. वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुमकुम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है. यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है.

 

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