Tuesday, August 4, 2020

राजनेता अमर सिंह से न्यूज 1 इंडिया टीवी के राजनीतिक संपादक संजय सिंह द्वारा लिए गए 55 मिनट लंबे साक्षात्कार का सम्पूर्ण भाग


लोकसभा चुनाव-2019 से कुछ माह पहले (दिसम्बर-2018) राजनेता अमर सिंह से न्यूज 1 इंडिया टीवी के राजनीतिक संपादक संजय सिंह द्वारा लिए गए 55 मिनट लंबे साक्षात्कार का सम्पूर्ण भाग-

‘बुआ-बबुआ का गठबन्धन इकतरफा सियासी इश्क था’
‘अमिताभ ‘हिन्दुस्तान के ठग’ हैं’
‘मेरे पर जब संकट आया तो सबसे पहले अनिल अंबानी भगे’
‘जब जया ने पूरी फिल्म यूनिट के सामने अमिताभ को जोर से डॉटा और कहा कि तुम मुझे एक्टिंग सिखाओगे !’
‘छद्म धर्मनिरपेक्षता के पीछे क्रूर वीभत्स चेहरा छिपा है’
‘चंद्रशेखर जी थे मेरे रोल मॉडल’
‘हिंदुस्तान के कई युवाओं को इकतरफा इश्क़ है, जैसे एक फ़िल्म में रणवीर कपूर को अनुष्का शर्मा से थी। वो घास नहीं डाल रही थी, और इनकी लार टपक रही थी’
‘….शिवपाल ने अखिलेश से माइक छीन लिया और कहा कि तुम अमर सिंह के पैरों की धूल भी नहीं हो’

संजय : अमर सिंह जी आपके बारे में आम धारणा है कि आप यारी और दुश्मनी बहुत ही शिद्दत से निभाते हैं। अमिताभ बच्चन की फिल्म का एक गाना मुझे याद आ रहा है, जो आप पर सटीक बैठता है – यारों का मैं यार, दुश्मनों का दुश्मन.. दे दनादन..। तो दे दनादन में इन दिनों आपके निशाने पर कौन है ?
अमर- पहले तो गाना ठीक करें। जी पी सिप्पी की फिल्म थी। फिल्म का नाम ‘शान’ था। गाना कुछ ऐसा था- दोस्तों से दोस्ती, दुश्मनों से बदला लिया, जो भी किया शान से।

संजय : तो इस समय आपके निशाने पर आजम खान साहब हैं ?

अमर- आजम खान मेरे दुश्मन नहीं, आजम खान देश के दुश्मन हैं, राष्ट्र के दुश्मन हैं, सभ्यता के दुश्मन हैं, संस्कृति के दुश्मन हैं, समाज की रवायत के दुश्मन हैं। भारत माता को डायन कहते हैं। इसलिए भारत माता के लिए अशुभ हैं। हिन्दुओं की बच्चियों को तेजाब से नहलाके, गलाके जलाने की बात करते हैं। अपने मन में वितृष्णा और घृणा की गन्दी भावनाओं को लिए हुये बुराई की पराकाष्ठा के प्रतीक हैं। जीवन में, सृष्टि में जो भी तमस है.. अॅधेरा है, उसके प्रतीक हैं। आजम खान क्या हैं, उसके वर्णन में अगर मैं लगा रहा, तो मुझे लगता है कि आपके इंटरव्यू का जो भी समय है वह सारा उसी में खत्म हो जायेगा।

संजय : आपने आजम खान के खिलाफ लखनऊ के एक थाने में एफआईआर दर्ज कराया है। मैंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का इंटरव्यू किया था, जिसमें उनसे यह भी पूछा था कि अमर सिंह जी ने लखनऊ में आजम खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया है, तो उसमें क्या हो रहा है ? पुलिस क्या कर रही है ? तो योगी जी ने कहा था कि कानून अपना काम करेगा। आप पुलिस की कार्रवाई से कितना संतुष्ट हैं ?

अमर- प्रतीक्षा कर रहे हैं.. उस छण की, उस अवसर की, हिंदुत्व के सरकार की, हिन्दू संस्कृति के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम राम की मर्यादा को मानने वाली उत्तर प्रदेश सरकार से न्याय की। एक ऐसा वीभत्स व्यक्ति जो देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री को आतंकवादी कहता है। अपने को दाऊद और अबू सलेम का मित्र सार्वजनिक रूप से घोषित करता है। जम्मू-कश्मीर को हमारे देश का हिस्सा नहीं, बल्कि पाकिस्तान का अविभाज्य अंग मानता है। बुरहानी, हाफिज सईद, तैमूर, नादिर शाह अब्दाली, गजनवी और खिलजी के परम्परा का मुसलमान है। उसके विरुद्ध उम्मीद करता हूं कि आपके साक्षात्कार के बाद जरूर कार्रवाई होगी। हम इंतजार करेंगे कयामत तक इन्कवायरी का।

संजय : अंजाम तक पहुँचा कर रहेंगे ?

अमर- जी, खुदा करे कि कयामत हो और इन्क्वायरी के नतीजे आयें।

संजय : अमर सिंह जी, समाजवादी पार्टी को आपने एक खास सेगमेंट से निकाल कर एलीट और प्रबुद्ध क्लास तक पहुंचाया। भारत की राष्ट्रीय राजनीति तक ले आये। पार्टी को बड़े-बड़े नामचीन लोगों और ग्लैमर की दुनिया से जोड़ा। तो वह कौन सी बात थी, या फिर यह कहें कि वह कौन सा टर्निग प्वाइंट था, जब तल्खी का माहौल बना और आप वहां से बाहर हुए ?

अमर – हमारे पूरे शरीर के अवयवों में कुछ लोग जिस अवयव को सबसे महत्वपूर्ण मानें, लेकिन विवाद की जड़ जीभ होती है। क्यों कि जीभ बहुत लचीली होती है। उसमें हड्डी नहीं होती है। बड़े आराम से यह जीभ ऊपर नीचे, अनियंत्रित घूमती है। द्रोपदी की जीभ ने दुर्योधन को अंधा कह दिया तो महाभारत हो गया। इसी तरह से पुराणों में उद्धरण हैं कि नारद जी ने कभी कुछ कह दिया तो पता नहीं क्या-क्या हो गया।
तो जीभ भावों की अभिव्यक्ति करती है। आप मन के खल हो, कामी हो, दुष्ट हो, विग्रही हो, लेकिन इन सारे अवगुणों को मस्तिष्क से उद्दारित करने के लिए जीभ का इस्तेमाल है। और अगर उस जीभ को आप संतुलित कर लें तो सारे विग्रह आप तक सीमित रहते हैं और बाहर पता नहीं चलता।

दरअसल सारा का सारा मामला अखिलेश यादव के बिना हड्डी की लचीली जीभ से सार्वजनिक तौर पर निकले अपमानजनक उस बयान से ताल्लुक रखता है, जिसमें उन्होंने मेरे बारे में कहा था.. वह वहां बैठा था.. वहां से आया था.. वह दलाल अमर बैठा था..।

संजय : उन्होंने (अखिलेश) ऐसा बोला था !

अमर- जी, ऐसा उन्होंने कहा था, तब शिवपाल यादव ने माइक छीनकर कहा था- चुप रहो, तुम अमर सिंह की क्या बात करते हो! तुम अमर सिंह के पांव की धूल तक नहीं हो। उस घटना ने मुझे बहुत विचलित किया।
हमारे शयनकक्ष में प्रीतम को प्रीतमा मारे, कुछ भी कहे। पत्नी पति के सिर के बाल नोच ले। लेकिन वही जो शयनागार की बात है, जो अन्त:पुर की बात है, सार्वजनिक मंच पर आ जाये, तो कटुता बढ़ जाती है। मैं आपको उदाहरण दूं- ‘कभी खुशी-कभी गम’ फिल्म के सेट पर जया बच्चन ने पूरी फिल्म यूनिट और मेरे सामने अभिताभ बच्चन को बहुत जोर से डांटकर कहा कि ”तुम मुझे अभिनय सिखाओगे ! जब तुम संघर्ष कर रहे थे तो मैं बहुत बड़ी स्टार बन चुकी थी। तुम आज ‘ब्लैक’ कर रहे हो, मैं ‘कोशिश’ करके छोड़ चुकी हूं। इसलिए मुझे टिप्स मत दो। तुम अपना काम करो मैं अपना काम करूंगी।”

उस समय मैं एबीसीएल कम्पनी में वाइस चेयरमैन था। तो मैं फिल्म बना रहा था। उस फिल्म में माता-पिता-बेटा की कहानी थी। माता-पिता के रूप में अमिताभ-जया को तथा बेटे के रूप में अभिषेक को लिया था। उस घटना के बाद अमिताभ बच्चन ने जया बच्चन के साथ काम करना छोड़ दिया।

संजय : अच्छा, उस फिल्म के बाद से ?

अमर- हां, उस फिल्म के बाद से। ‘कभी खुशी-कभी गम’ की उस घटना के बाद उनका पति बोला, मैं अमिताभ बच्चन हूं और उन्होंने जया के साथ काम करना छोड़ दिया। मुझे फ़िल्म में शर्मिला टैगोर को पत्नी बनाना पड़ा। जान अब्राहम को बेटा बनाना पड़ा। पिक्चर अच्छी बनी थी। लेकिन जो उत्सुकता होती है, वो नहीं थी। वो जीभ का कमाल था। जीभ सार्वजनिक रूप से चले तो फिर जब बात निकल जाती है..। जगजीत सिंह जी ने एक खूबसूरत नज्म गायी है, जो जीभ से निकली बातों पर ही है- ‘‘ बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी..।’’ तो ये बात दूर तक चली गयी।

संजय : अखिलेश यादव को आपने बहुत सम्मान दिया। उन्हें प्यार भी दिया..

अमर-(सवाल बीच में ही काटकर) मैं समझता हूँ की ये साक्षात्कार मेरा है। अखिलेश का नहीं। और.. गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा, हाफिज खुदा तुम्हारा..। अब जो आरोप मुझ पर लगता था कि नायक नहीं खलनायक है अमर सिंह, जुल्मी बड़ा दुखदायक हैं अमर सिंह। इसने हमारा घर तोड़ दिया। लालू यादव ने कहा कि घरफोड़वा है अमर सिंह। तो लालू जी तो जेल में हैं। तो उनका घर किसने तोड़ दिया ! फोड़ दिया !

संजय : मुलायम सिंह पुत्रमोह में इतना फंस गये कि उन्होंने अपने दोस्त अमर सिंह को…

अमर- (सवाल बीच में ही काटकर) देखिए, बड़ी ताज्जुब की बात है कि हमारे दोस्त हैं मुलायम सिंह। उनकी बुराई होती है, चुटकी ली जाती है तो मुझे पीड़ा होती है। अभी भी वो फंस जाते हैं। कैकेयी भरत के पुत्रमोह में फंस गयी। धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के मोह में फंस गये। अभी भी बड़े-बड़े नेता हैं। सारा आरोप लगाते रहें आप जैसे पत्रकार खूब चिल्लाते रहें वंशवाद..वंशवाद। लेकिन वंशवाद का ध्वज राष्ट्रीय ध्वज की तरह लहराया है..एकदम भारतीय राजनीति के उतुंग शिखर पर प्रवाहित, प्रसारित और संवाहित हो रहा है। तो इसलिए पुत्रमोह सबको है। पुत्रमोह, स्त्रीमोह, सत्तामोह सबको है। और इस मोह को बनाये रखने के लिए राजहठ, बालहठ, त्रियाहठ सबका उपयोग होता है।

संजय : अच्छा एक हाइपोथेटिकल सवाल है कि अगर मुलायम सिंह आपसे कहें कि आप आइए और हमारे घर में जो फूट हुई है, एक करने में आप हमारी मदद कीजिए ! क्या ऐसी संभावना बन सकती है ?

अमर- हाइपोथेटिकल सवाल क्यों ? प्रासंगिक, व्यावहारिक, सारगर्भित सवाल है ! यह ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतै नाच नचायो।

संजय : मतलब वहां जाने की अब कोई गुंजाइश नहीं है ?

अमर- कोई प्रश्न ही नहीं है। फिर जायेंगे तो इस बात की क्या सुरक्षा है कि फिर अपमान नहीं होगा ! एक बार हो..गलती होती है। दो बार हो.. तो सोची-समझी साजिश होती है। और फिर एक गलती को आप माफ कर दीजिए। साजिश से उबरकर आप तिबारा कोई गलती कीजिए। तो इसका मतलब आपका शत्रु चतुर है। आप मूर्ख हैं। तो मैं ऐसा थोड़े ही हूँ। सोमनाथ के मंदिर पर 14 बार लूट हई और 14 बार पृथ्वीराज चौहान ने छोड़ दिया। अब तक तो दो बार हमारी छूट्टाछूट्टी हो गई.. अब अगर तीसरी बार हुई तो वो हमसे निपट लें या हम उनसे निपट लें।

संजय : समाजवादी पार्टी को आपने नमाजवादी पार्टी की संज्ञा दी थी। अखिलेश को आपने नमाजवादी कहा !

अमर- जब रामलला के समर्थन में भारी भीड़ एकत्रित हो रही थी, तो अखिलेश ने कहा कि आर्मी को जाना चाहिए और इनकी भावनाओं को कुचलना चाहिए। कोई भी मुसलमान जो मुकद्दस मक्का और मदीना जाता है, वहां तो ताकतवर से ताकतवर मुसलमान जाकर यही कहता है न कि ‘बेकस पर करम कीजिए सरकारे मदीना’। वहां तो सरकार मदीना की है। तो गया-बीता हिन्दू भी जो है.. वो भगवान रामचन्द्र के आस्था और भक्ति और अनुराग को भले चाहे न रखे लेकिन ऐसा कैसे कह सकता है कि वहां मन्दिर ना बनें ! इसलिए वहां फौज लगा दो !
….और मूर्खों को तो ये पता ही नहीं है कि मन्दिर तो वहां है ही। रामलला भी हैं। विधि-विधान से पूजा भी आरंभ है। कोई दिक्कत नहीं है। हां, वहां भगवान राम का जन्म स्थान होने के कारण जिस तरह का भव्य मन्दिर होना चाहिए, वैसा नहीं है।

संजय : अयोध्या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और फैसले में जो विलम्ब हो रहा है, आपको नहीं लगता कि इतने अहम मामले में लेट से हिन्दू-मुसलमान के बीच आपसी वैमनस्यता और खाई बढ़ती ही जा रही है ?

अमर- देखिए, हम सुप्रीम कोर्ट को अकेले दोष नहीं देंगे। सुप्रीम कोर्ट, सरकार और हम सब.. । हम सब लोग जब अपनी तांई (बारी) आती है और जब तारीख मिलती है तब हम लम्बी सासें भरते हैं। पी चिदम्बरम् को चार-पांच जमानत मिली है। पूछिए उनकी मन की हालत क्या है ? वो चाहते हैं कि तारीख पर तारीख और जमानत पर जमानत चलती रहे ! भले हम मर जायें। इसलिए कहते हैं ना- ‘‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड, जस्टिस बरीड इज अलसो जस्टिस हरीड।’’

संजय : पिछले दिनों आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से लखनऊ में मिले थे, तो राजनीतिक गलियारे में इस बात का बहुत ही कयास था कि आप भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहे हैं ?

अमर- योगी जी से पिछले दिनों हम लखनऊ में मिले थे तो यह खबर बन गयी, क्यों कि अब वे मुख्यमंत्री हैं। योगी जी से हम दशकों से मिल रहे हैं। उस समय वह खबर नहीं बनती थी। हम गोरखनाथ मंदिर में उनसे मिलते थे, बच्चों का बाल कटवाने के लिए। क्यों कि वो क्षत्रियों का पीठ है। उस समय योगी जी माला लेकर खड़े रहते थे। खबर नहीं बनती थी। ईश्वर करे वो लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहें। अगर दुर्भाग्यवश किसी कारण से वो मुख्यमंत्री नहीं भी रहेंगे, तब भी हमारे पीठाधीश तो रहेंगे ही .. क्षत्रियों के। मुख्यमंत्री रहें ना रहें।

संजय : उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज पर आपकी क्या टिप्पणी है ? आप मानते है कि योगीराज में प्रदेश तरक्की की राह पर है ?

अमर- हमनें विभिन्न मंत्रियों के कामकाज का आकलन तो नहीं किया है, लेकिन योगी जी का काम निश्चित रूप से अच्छा हो रहा है। लेकिन वो कहते हैं ना कि महिमा घटी समुद्र की रावण बसा पड़ोस। योगी जी की समस्या उनके अधिकारी हैं। ब्यूरोक्रेसी है।

संजय : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आप भी प्रशंसक हैं। आपको कितना भरोसा है मोदी के वर्ककल्चर में ?

अमर- जी, यकीन तो इसीलिए है ना। उन्होंने दो करोड़ घरों में बिना खर्चा के बल्ब जला दिया। एक सिलाई की मशीन भेज दिया। लिज्जत पापड़ का जो मॉडल चला था गुजरात में उसके आधार पर महिलाओं का स्किल डेवलपमेंट कर दिया। ये तमाम चीजें मोदी जी ने की हैं। छोटी-छोटी चीज की हैं, सेल्फ अटेस्टेशन किया है। अब अधिकारी के पास नहीं जाना है। आप भारत के सम्मानित नागरिक हैं। आप खुद से लिख दीजिए- सेल्फ अटेस्टेड, सेल्फ डिक्लेयर्ड। दिक्कत वहां आती है जब लोग बोलते हैं विरोध अपने-अपने टाइम में टाटा, बिड़ला, अंबानी को बगल में बैठाता है.. और जैसे उनका दौर खत्म होता है, तो जो आता है उनके बगल में चला जाता है। इस तरह की अपारचूनिज्म लोग करेंगे।

आज महाराणा प्रताप की जरूरत नहीं है, जो नई नस्ल के हैं ..उनकी वीरता की जरूरत नहीं है। बल्कि आज इस बात की भी बड़ी आवश्यकता है कि लोग सिद्धान्तों के प्रति कमिट रहें। लोगों के अन्दर कुछ पाकर के अहंकार ना आ जाये। जैसे कि निराला जी ने दशकों पहले कहा था- ‘‘ सुन-सुन-सुन, अब, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब..।’’ गुलाब तुम्हें अपनी सुर्खी से घमंड नहीं होना चाहिए। अपनी खुशबू पर इतराना नहीं चाहिए। हमनें तुमको इसी रूप में भेजा है। यह एक पतली लाइन है, जिसे वर्तमान नेता समझ नहीं पा रहे हैं।

संजय : आपने कहा था कि अखिलेश और मायावती के बीच जो गठबन्धन था, वह इकतरफा सियासी इश्क था ?

अमर- जी, ये एकतरफा मोहब्बत था, जिस तरह से फिल्म- ‘ए दिल है मुश्किल में’ रणवीर कपूर को अनुष्का शर्मा से थी। पलटकर देख नहीं रही थी और इनकी लार टपक रही थी। हिन्दुस्तान के कइयों नौजवानों को इकतरफा इश्क है। बुआ-बबुआ का सियासी इश्क इकतरफा था! और जिससे इश्क होता है वही बड़ा होता है.. वही स्टार होता है। जिसमें आकर्षण होता है, उसी से तो इश्क होता है। उसका गलत मतलब मत लीजिएगा। वो (मायावती) राजनीति में बड़ी एन्थयूसासिस्ट है। बबुआ (अखिलेश) को मालूम है कि अगर सियासी इश्क परवान नहीं चढ़ा, तो ये बबुआ का अंगूठा है.. और ये बबुआ का मुंह है (अपना अगूंठा मुँह में डालकर चूसने लगते हैं) और बाकी जो है वो आधा काम उन्होंने (अखिलेश) कर दिया, अंकल और बाप को दरकिनार करके। बाकी आधा काम जो है वो चाचा-जानी (रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव) ने कर दिया। अब वो एक कंकाल है राजनीति का। स्केलेटन ऑफ पालिटिक्स।

संजय : आप भारतीय जनता पार्टी में जायेंगे ?

अमर – अच्छा लगा ! आप सीधे एकदम ठांय-ठांय करके पूछ रहे हैं। आप ये बताइये कि क्या भारतीय जनता पार्टी मुझे लेगी ? मुझे पता नहीं है। जब मुझे ये पता ही नहीं है कि मुझे वे लेंगे या नहीं लेंगे ? उम्र के इस पड़ाव में जब मेरी उम्र 62 साल की है। जब पिछले 24 साल से लगातार सांसद हूँ, तो मुझको आप नरेश अग्रवाल बनाना चाहते हैं, कि मैं अपना बायोडाटा छपाऊं, कि मैं नरेश अग्रवाल हूँ.. मैं लोकतांत्रिक कांग्रेस में था, मैं राजीव शुक्ला का सिपाही था.. फिर मैं राजनाथ सिंह के काफिले में था..मेरी ये उपयोगिता है, कि मैं शराब के विज्ञापनों में और फलाना विज्ञापनों में देवी-देवताओं में सुर-असुर देखता हूँ। और उसके बाद मैं वहां चला जाऊं, और जाने के बाद ? देखिए, जब आदमी अपना सम्मान नहीं करता है, जो उसका सम्मान समाज नहीं करता है। जहां तक हमारी बात है हम भारतीय जनता पार्टी के दर्शन में थे, हैं और रहेंगे। हिन्दुस्तान में 125 करोड़ नागरिक हैं। क्या सब के सब भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं।

संजय : नहीं, आप जब समाजवादी पार्टी में थे तो आपने भाजपा का बराबर विरोध किया ? लेकिन ऐसा क्या कुछ दिखा भारतीय जनता पार्टी में जो उसकी और मोदी जी की आप तारीफ कर रहे हैं! कुछ तो होगा, जिससे आप भाजपा के प्रति आकर्षित हुए होंगे ?

अमर- हम बताते हैं। मूल बाते हैं। ..जवान बेटियों को आप तेजाब से नहलाओ। पत्नी को और घर के लोगों को बुलाकर काटो ! अगर ये रिश्ता है एक ओर जो हमारे प्रति है। दूसरी ओर मैं हूं.. मैंने न्यूक्लियर डील करायी। अपने करियर का सबसे अच्छा काम किया। तो लुंगीधारी चिदम्बरम् ने एक कलम का लंबा टीका लगाके मुझे तिहाड़ जेल में भेजा। मुझे लाकअप में बंद किया जाता है और सुबह पांच बजे से मैं सुनता था- ‘‘ ए मालिक तेरे बंदे हम, कैसे हों हमारे करम’’, तो मुझे लगता था और सोचता था कि चिदम्बरम् मैंने ऐसा कौन सा करम किया कि तुम मुझे ऐसे संदेश प्रसारित कर रहे हो ! मेरी ईश्वर से प्रार्थना है हृदय की गहराइयों से कि तारीख पर तारीख, बेल पर बेल (एयरसेल-मैक्सिस मामले में पी चिदम्बरम् की सीबीआई/ईडी जांच और कोर्ट में चल रहे मामले को लेकर) बंद हो। चार्जशीट दाखिल हो गयी है। अवैध धन के सबूत इकट्ठे किये गये हैं, साक्ष्य मिल गये हैं। उनको अपनी स्थिति का पता चल गया है। और तो और आवश्यक विधिक स्वीकृत भी मिल गयी है कि मुकद्ममा चलाओ…। और बेल नहीं .. अब जेल..जेल और सिर्फ जेल। और मैं गॉधी जी द्वारा कही गयी उनकी इस बात को मानता हूँ कि घृणा पाप से करो, पापी से नहीं। तो पापी चिदम्बरम् जब जेल जायेगा तो हमारी घृणा उसके पाप से है, उस पापी से नहीं। हमारा साथ रहा है, उससे मिलने जरूर जाऊंगा। और उससे पूछूंगा कि मैं भी इसी जेल के फर्श पर बिना किसी दोष के सोया हूँ, अब तुम्हारे दो दिन कैसे बीते इस फर्श पर ?


संजय : जेल में बिताये गये आपके दिन आपको जब याद आते होंगे, तो मन में पीड़ा तो होती ही होगी ?

अमर – जी, उनकी (यूपीए) सरकार बचाओ। अपने करियर का सबसे अच्छा काम करो। देश को परमाणु निर्भर बनाने में सहयोग दो। डा. मनमोहन सिंह के अलावा किसी ने भी तारीफ का एक शब्द भी नहीं बोला। ये लोग (कांग्रेसी) स्वीकृति देने में भी कंजूस, एहसान मानने में भी कंजूस। इनका भला करो तो जेल भेज देते हैं। ये ताजमहल बनाने वाले शहंशाह के उन कारीगरों की तरह है जिनको बुलाकर के हुजूर-ए-आली कहते हैं कि सहकार बनाया है तुमने बंधुओं, हमें फक्र है, लेकिन हमारी महबूबा की मोहब्बत में ऐसी सहकार दोबारा न बने, इसके लिए हम तुम्हें इनाम देते हैं। तुम्हारे हाथ काट लिए जाएं !
ऐसे लोगों का साथ देना क्या धर्मनिरपेक्षता है ! बच्चियों को तेजाब से नहलाना धर्मनिरपेक्षता है! हमारे घर की और हिन्दू समाज की औरतों का काटना धर्मनिरपेक्षता है ? यह सब कुछ मुझे दिखाना, इसलिए वो नमाजवादी हैं। और इसलिए मोदी जी मुझे अच्छे लगते हैं और भारतीय जनता पार्टी मुझे अच्छी लगती है। मैं गुरू गोलवरकर की किताब, दीन दयाल का एकात्मवाद और नाना जी देशमुख का समसामयिक तत्कालीन साहित्य भी पढ़ा हूँ। लेकिन इस पठन-पाठन के ऊर्ध्व जीवन के संघर्ष में चलते-चलते अपने पांव से धूल उड़ाकर भी देखा हूँ कि इस क्षद्म धर्मनिरपेक्षता के पीछे कितना क्रूर और वीभत्स चेहरा है।

संजय : अमर सिंह जी, कुछ साल पहले तक आप, सुब्रत राय सहारा, अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी की चौकड़ी चर्चा में रहती थी। चौकड़ी से एक-एक कर लोग क्यों निकल गये और आप अकेले हो गये ? और ये भी देखा गया था कि सबके सुख-दुख में आप हमेशा खड़े नजर आते थे।

अमर- जी, एक-एक का उत्तर दूंगा। भले ही विवाद हो जाए। आग लग जाए। सुब्रत राय सहारा। एक सज्जन हैं उपेन्द्र राय, आजकल जेल में हैं, तहलका चलाते थे, तहलका मचाके रखा है। सुब्रत राय सहारा के उपेन्द्र राय नाक के बाल हो गये। और जैसे राजा रुक्का देते थे सुब्रत राय ने रुक्का दिया.. एक्सेस टू ऑल डिपार्टमेंट, माय बेडरूम, स्लीपिंग रूम….एवरीथिंग.. उनका डोगरा, वोगरा, सोगरा सब नेपथ्य के लोग हो गये। आर्डर ..आर्डर..आर्डर .. नो डिसआर्डर, ये उपेन्द्र राय हो गये। उपेन्द्र राय ने यहां (दिल्ली में) पर एक भोज दिया। उसमें सहारा के सभी राज्यों के पत्रकार साथियों और संपादकों को बुलाया गया। और जैसा कि सहारा से जुड़े लोगों को पता है सबको टारगेट दे दिया गया कि किसको कितने वीवीआईपी लेके आने हैं। संबंध हो या ना हो आभामंडल बनना है। वो सब वीवीआईपी आये, बहुत शोर हुआ। लेकिन इस पूरे चक्र में मुझे एक भी निमंत्रण नहीं दिया गया। और वह दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख का दिन था। पूछिए क्यों ? क्यों कि मेरे लिए मित्रता और संबंध मुश्किल से छोड़ने का विषय है। छोड़ सकता नहीं था। आज भी ओ.पी. श्रीवास्तव जैसे पुराने अच्छे लोग वहां (सहारा में) हैं, जो इसलिए फँसे हुए हैं कि फँसे हुए हैं। नहीं तो बाबा रामदेव की जय कभी भी बोल सकते हैं। उनकी पत्नी तो रामदेव के ही साथ हैं। मानसिक रूप से वो (ओ पी श्रीवास्तव) रामदेव के साथ हैं, लेकिन नैतिक रूप से वो वहाँ (सहारा) फँसे हुए हैं, क्यों कि वो अच्छे आदमी हैं। उनके साथ भी बड़ा अन्याय हुआ। उनके सगे साढ़ू को बुलवाया गया और सिर पर डंडा बजवाया गया। कोई बोलेगा नहीं। वो खुद नहीं बोलेंगे। उनकी हिम्मत नहीं है। मैं बोल रहा हूँ। आन रिकार्ड बोल रहा हूँ। .. तो जब उस पार्टी में नहीं बुलाया गया तो मैंने कहा कि बस ठीक है। उसके बाद मैंने राय साहब को फोन करके कहा- ‘‘ हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया, सुब्रत राय साहब फासला प्यार का अब दोनों से मिटाया न गया।’’

संजय : और आपने अमिताभ बच्चन के बुरे दिनों में उनकी काफी मदद की थी। जहाँ तक मेरी जानकारी है !

अमर- एकदम सही जानकारी है। बुरे दिनों में हमने…यहाँ संशोधन करूंगा कि हमने उनकी नहीं, अपनी मदद की थी। आप किसी पति से कहिए कि आपने अपनी पत्नी की मदद की थी ! किसी से संबंध जब इतना घनिष्ठ हो, जब उसके मन की वेदना आपके मन की वेदना बन जाए, तो मैं यह कहूँ कि मैंने अमिताभ बच्चन की मदद की तो ये गलत है। क्योंकि उस तरह की मदद कोई आदमी सामान्यत: करेगा ही नहीं, अगर उस पीड़ा की अनुभूति उसे स्वयं नहीं होगी। लेकिन एक गलती हमसे हो गई। अँग्रेजी में एक कहावत है- ‘ग्रैटीट्यूड इज एन एटीट्यूड, एन्ड विदाउट दिस एटीट्यूड आँफ ग्रैटीट्यूड यू कैन नाट गो टू लैटीट्यूड।’’ तो उनके पास ना तो एटीट्यूड है, ना ही ग्रैटीट्यूड है और इसलिए लैटीट्यूड भी नहीं है। लैटीट्यूड नहीं है इसलिए ‘हिन्दुस्तान का ठग’ है। ये आमीर खान के साथ आते हैं और बुरी तरह से नोस डाइव करते हैं। परिवार के तीन सदस्य हैं और उनकी पहचान स्टार की है। लड़के (अभिषेक बच्चन) की फिल्म आयी ‘मनमर्जियां’, दर्शकों ने कहा ये आपके मन की मर्जियां होगी, हमारे मन की नहीं। दूसरे स्वर में इल्लै। बहुरानी (ऐश्वर्या राय) की फिल्म आयी फन्ने खाँ। फन्ने खाँ ही हो गयी। तीसरी फिल्म आयी ‘हिन्दुस्तान के ठग’। जनता ने कहा ठगो मत ! हम होशियार हो गये तुमसे। कर्मफल यहीं मिलता है। तो उनसे क्या आशा करें।

संजय : लेकिन मन में मलाल तो होता ही होगा। जिनके लिए इतना कुछ किया…?

अमर- कोई मलाल नहीं है। क्यों कि उन लोगों से हमें मुक्ति मिली।

संजय : जया बच्चन ने आपके खिलाफ बयान दिया था ?

अमर- नहीं, कभी नहीं बोला मेरे खिलाफ। बच्चन परिवार का एक गुण हम बताते हैं। बच्चन परिवार इस मामले में (बयान देने या बोलने के मामले में) सब संयमित है..अद्भुत परिवार है। जब उसके पास डिफेंस नहीं होता तो वो चुप हो जाता है। खामोश हो जाता है। उसे मालूम है कि अगर वो बोलेगा तो मरेगा, फंसेगा, जलेगा, भुनेगा और कटेगा। वो अपने आप में घुटता रहता है, लेकिन चुप रहता है। और वो लोग सबेरे नाश्ते के टेबल पर ये तय कर लेते हैं कि आज यह प्रश्न उठ सकता है, लेकिन उसके जवाब में एक ही चीज करनी है- मौन ..मौन, मौन और मौन। सिर्फ मौन।
…तो इसलिए जो हमारे मन की अशांति की बात आप करते हैं, तो मैं बता दूं की कोई अशांति नहीं है। अशांति इसलिए नहीं है कि आप (अमिताभ बच्चन) कम से कम पनामा (पनामा पेपर लीक) में सौ- दो सौ करोड़ रुपये की जुर्माने की, जुर्माना लगे या कुछ और कार्रवाई हो, तो फिर पनामा पेपर में नाम भी आ गए और टीम भी चली गयी। और इससे वो ज्यादा विचलित हो गए जितनी मुझे खबर है ! या तो जुर्माना लगेगा या फिर ईश्वर करे कि जेल न हो। जिन्दगी भर दाल-चावल-साबुन-सीमेंट (विज्ञापनों से) बेचकर इतना कमाया है कि सरकारी कोष में चला जाएगा। ये दंड उनके लिए किसी भी दंड से बड़ा होगा। लेकिन कम से कम अब उनके दंडात्मक, प्रक्रियात्मक, आर्थिक शोधन से हो रहे वेदना के प्रतिकार के लिए.. उनकी कोई फाइल मेरे पास तो नहीं आयेगी। हम तो मुक्त हैं ना।

संजय : आप मुक्त हैं ?

अमर- हम मुक्त हैं। चेतन आनन्द की फिल्म ‘हकीकत’ में कैफी साहब की एक नज्म थी- ‘‘जरा सी आहट होती है तो दिल कहता है कि कहीं ये वो तो नहीं.।’’ तो जब तक इन लोगों से संबंध रहता था, फोन की घंटी बजती थी तो दिल कहता था कि ‘कहीं ये समस्या तो नहीं !’

संजय : आपके जीवन पर भी एक फीचर फिल्म (बायोपिक) बनने जा रही है। ऐसा पता चला है ?

अमर- किताब भी हम लिख रहे हैं। प्रकाशक से बात भी हुयी है, लेकिन समय ही नहीं मिलता। आप ही को बड़ी मुश्किल से समय दे पाया हूँ। कुछ लोग मेरे पर फिल्म बनाना चाहते हैं। कुछ वेब सीरयल बनाना चाहते हैं।

संजय : आप पर जो फिल्म बनेगी, उसमें आपका किरदार कौन अभिनेता निभाये ऐसी कोई आपकी चाहत ?

अमर- हम इतने विवादित व्यक्ति हैं। यह अधिकार तो फिल्म निदेशक के पास होगा।

संजय : फिल्मी दुनिया में आपकी अच्छी पकड़ है। सबसे आपके अच्छे ताल्लुक हैं ?

अमर- नहीं, हमारे किसी से अच्छे ताल्लुक नहीं हैं। क्यों कि अभिनेताओं से किसी के अच्छे तालुकात हो ही नहीं सकते। वे अभिनय करते-करते वास्तविक जीवन में भी अभिनय करने लगते हैं। 90 फीसद फिल्मी दुनिया के लोग एक साथ खाना खाते हैं, एक साथ दारू पीते हैं। लेकिन पीठ उठाते ही गाली देना शुरू कर देते हैं। लेकिन जैसे ही आमना-सामना होता है तो शरीर हिलने लगता है और बोलने लगते हैं- ब्रो.. ब्रो (ब्रदर)। इसलिए उनसे संबंधों को लेकर मुझे कोई गलतफहमी नहीं है।

संजय : एक और सवाल मेरे जेहन में आ रहा है !

अमर- जी, अनिल अंबानी छूट गये थे। अनिल अंबानी.. जब उनके जीवन की विषम परिस्थिति आई तो उनकी मुझसे अपेक्षा थी कि हम हमेशा उनके साथ रहें। और हम रहे भी। उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी से मेरा कोई झगड़ा नहीं था। उनकी वजह से हुआ, क्यों कि मैंने उनका साथ दिया। मेरे जीवन में जब विषम परिस्थिति आयी ..विषमता आयी. तो सबसे पहले जो गया.. सबसे पहले भागने वालों की फेहरिस्त में वे (अनिल अंबानी) अव्वल नम्बर पर थे। हमारे यहां पूरब में कहते हैं ना कि ‘‘ही वेन्ट वेन्टे वेन्ट.. अईसन वेन्ट कि केमे नाट।’

संजय : तो वे निकल गये !

अमर- वेन्ट वेन्ट। अइसन वेन्ट कि ही केमे नाट।

संजय : राजपूत समाज से दो कद्दावर नेता हुए, मैं तीन मानता हूँ। विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर और आप ।

अमर- आप राजनाथ सिंह को बड़ा नेता नहीं मानते !

संजय : हां, ये छूट रहे थे। ये आपने याद दिला दिया। और मुझे उनकी अवमानना से बचा लिया।

अमर- योगी आदित्यनाथ जी बड़े नेता नहीं हैं ! ऐसा मत करिए (हँसते हैं)।

संजय : योगी जी सन्यासी हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में आपकी क्या धारणा है ?

अमर- विश्वनाथ प्रताप सिंह जी को मैं राजपूत नेता नहीं मानता। राजपूतों में दो वर्ग है। एक अभिजात्य राजपूत होता है तो राजा होता है। जो हुकुम, खमागानी और पधारो.. सधारो। यही इनकी भाषा होती है। एक बार करनी सिंह जी , कर्ण सिंह जी, गायकवाड़ साहब और सिंधिया साहिबा बैठी थीं.. और उनका आपसी संबोधन ऐसे हो रहा था- और ग्वालियर बताएं क्या हो रहा, और बीकानेर आप कब पधारे, कश्मीर बताइये आप कैसे हैं ! मृत्यु भी होती है तो बोलते हैं कि बीकानेर गये। ये इनकी अपनी विलक्षणतायें हैं। इनकी अपनी राजशाही चली गयी, लेकिन राजशाही की ऐंठन नहीं गयी। तो भले ही राजा मांडा की छोटी-मोटी रियासत रही होगी। मांडा के बगल में शंकरगढ़ भी है। तमाम रियासतें हैं। लेकिन इनकी अकड़ वही है। वैवाहिक संबंध भी होते हैं तो अपने रजवाड़े में ही होते हैं। राजा राजपूत और प्रजा राजपूत। ये गड़बड़ है इनके यहां।

दूसरी बात यह है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में दो नेता हुए, दोनों अब स्वर्गीय हैं- नारायण दत्त तिवारी और विश्वनाथ प्रताप सिंह। नारायण दत्त तिवारी जी के लिए विनम्रता एक अस्त्र थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए ईमानदारी। तो विनम्रता एक स्वभाव होनी चाहिए अस्त्र नहीं। मुझे याद है कि हमारे सामने तिवारी जी को एक आम आदमी ने बड़ी गंदी-गंदी गालियाँ दी। लेकिन तिवारी जी के चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं आयी और वे मुस्कराते रहे। जी भर गाली देने के बाद उस व्यक्ति ने तिवारी जी से पूछा कि हमनें आपको नेता माना, हमें क्या मिला ? तिवारी जी रुक गये और उसके (गाली देने वाले व्यक्ति) कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘’तुम्हें अनवरत गाली देने का अधिकार हमारे जैसे लोगों ने दिया, लोकशाही ने दिया, ये क्या कम बड़ी बात है !” इतना बोल कर वह आगे चले गये। लेकिन उस व्यक्ति की समस्या का कोई निदान नहीं किये।

दूसरे नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह जी की ईमानदारी आपको बताता हूॅं। तीन नम्बर साउथ एवेन्यू लेन के उनके (चन्द्रशेखर जी) झोपड़ी में एक बार वी पी सिंह जी आये। उनके साथ अरुण नेहरू भी थे। मैं चन्द्रशेखर जी के पास बैठा हुआ था। वे दोनों आये तो मैं उठने लगा, तो चन्द्रशेखर जी ने भोजपुरी में कहा कि तू बइठा.. कउन प्राइवेट बात बा ! हम भी बैठ गये निर्लज्ज, बेहाया की तरह। बात चलने लगी नैतिकता, ईमानदारी, सार्वजनिक जीवन के खर्चे के बारे में। तो वी पी सिंह साहब ने कहा कि हमारे पास जब भी कोई बड़ा उद्योगपति आता है, चाहे वो बिड़ला ही क्यों न हो, तो हम अपना ज्वाइंट सेक्रेटरी लेवल का अधिकारी मीटिंग में रखते हैं। वह यह नोट करता है कि कौन उद्योगपति आया था और यह बात हुयी..वह बात हुयी। मैं तो बहुत आनेस्ट हूँ।

चन्द्रशेखर जी सब सुन रहे थे। वे जमीन पर ही अपना आसन जमाये रहते थे। थोड़ा सा लेटे हुए थे आराम से, टेक लगाकर के, vp की बात सुनकर उचक कर बैठ गए। बोले, वी.पी.- आई एम वेरी डिस्आनेस्ट। एंड जो मंच बनता है, माइक बंधता है, सब हम लोग बनवाते हैं। उसमें पैसा लगता है। ये लोग देते हैं। यू आर वेरी आनेस्ट। बट योर आनेस्टी इज आन द कास्ट आफ द सम्स पीपुल लाइक मी। तुमको ना मंच बनवाना। ना माइक लगवाना है। आकरअपना कलफ वाला कुर्ता पहनकर भाषण देना है। तो हम समझते हैं कि चन्द्रशेखर जी सबसे ज्यादा ईमानदार थे। जो तम्बू और बम्बू के लिए पैसा चाहिए इसको मानते थे। गाँधी ज्यादा आनेस्ट थे। जो ये मानते थे कि जवाहर लाल नेहरू चाहिए, लेकिन नेहरू के साथ बजाज और बिड़ला भी चाहिए।

संजय : भारतीय राजनीति में आप किसे अपना रोल माडल मानते हैं ?

अमर- चन्द्रशेखर जी को। उनकी लंठई को। चन्द्रशेखर जी की कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था। उन्होंने मुझे बताया कि पाप और पुण्य क्या है। उनके अनुसार- ‘‘ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या.. जीवन पर रीति के मोहरे हैं, हर युग में बदलते धर्मो को बोलो कैसे अपनाओगे।’’ वो कहते थे कि किसी का मन दुखाना, किसी का शोषण करना, किसी से झूठ बोलना पाप है। चन्द्रशेखर जी बड़े निर्णायक काम करने वाले व्यक्ति थे। जब वो प्रधानमंत्री थे, उस समय इराक युद्ध चल रहा था। अमेरिकी चाहते थे कि उनके फाइटर जेट तेल लेने के लिए भारत में रुकें। बड़ा विवाद हुआ था। बहुत से लोग चाहते थे कि अनुमति न दी जाय। लेकिन उन्होंने अमेरिकी फाइटरों को तेल लेने के लिए एलाऊ कर दिया। उस समय बड़ी बुरी हालत थी, भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया था। तो उन्होंने देश के सोने को गिरवी कर दिया ताकि अर्थव्यवस्था ठीक रहे। चन्द्रशेखर जी अभूतपूर्व काम करते थे और विचलित नहीं होते थे।
ठीक उसी तरह से जयललिता कहती रहती थीं कि करुणानिधि तुम तमिल ईलम के आतंकवादियों से मिले हुए हो। भोड़सी में हम उनके (चन्द्रशेखर जी के) साथ थे। रा ने उसी वक्त पीएम चन्द्रशेखर जी को खबर किया। उस समय मोबाइल नहीं था। बहुत कम गाड़ियों में फोन था, मेरी गाड़ी में फोन था। मैंने कहा कि चला बैठा। बैठ गये। हमारे कार टेलीफोन से उन्होंने फोन किया, भाई कैबिनेट की मीटिंग बुला लीजिए। तमिलनाडु सरकार के डिस्मिसल की चिट्ठी टाइप कर लीजिये। राष्ट्रपति से समय ले लीजिए। और मुझे कुछ नहीं बताया। गये वहां। डिस्मिसल की चिट्ठी पर उन्होंने साइन किया। कैबिनेट को बताया। राष्ट्रपति से मिलने गये। और दो घंटे के अन्दर मामला खत्म। करुणानिधि की सरकार गिर गयी। चन्द्रशेखर जी के अन्दर निर्णय लेने की क्षमता थी।

और जब राजीव गाँधी ने कहा कि उनकी जासूसी के लिए हरियाणा के कान्सटेबल लगाये गये हैं। इस पर चन्द्रशेखर जी ने कहा कि अगर जासूसी के लिए प्रधानमंत्री को लगाना होगा तो राजीव गांधी के पीछे कान्सटेबल क्यों लगायेंगे ! मतलब ये हमारा अपमान है, हमारे विवेक का अपमान है। हमारी आलोचना करने का भी एक स्तर होना चाहिए। एक तर्क होना चाहिए। इसका मतलब उनका मन साफ नहीं है। तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। ये किसी को गुमान नहीं था कि ये इस्तीफा इतना गंभीर है। न कोई ऐसा कहता है और न करता है। दरअसल कांग्रेस भी नहीं चाहती थी कि सरकार चार महीने में गिरे। कम से कम साल भर अपनी तैयारी के लिए चाहती थी। विनाथ प्रताप जी से छुटकारा पाने के लिए कांग्रेस ने चन्द्रशेखर जी को प्रधानमंत्री बनाया था। कोई एहसान नहीं किया था। और एक साल उनको रखना चाहते थे कांग्रेसी। और कांग्रेस जो अब फिर गठबन्धन की बात करती है, चन्द्रशेखर जी हों, गुजराल हों, देवगौड़ा हों, चौधरी चरण सिंह हों, हर गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री को उसने ऊपर चढ़ाया है और फिर पाँव के नीचे से बोरी हटायी है।

संजय : आपने आजमगढ़ स्थित अपनी पैतृक सम्पत्ति को संस्कार भारती को दान कर दिया है। ऐसी खबरें मीडिया में आयी थीं ?


अमर – यह हमारी पैतृक सम्पत्ति नहीं है। जिला आजमगढ़, तहसील लालगंज, गांव- तलवार की सड़क पर यह सम्पत्ति है, जिसे मैंने संघ को समर्पित किया है। दान तो बहुत गंदा शब्द है। और समर्पित भी मैंने अपने स्वार्थ में किया है। खाली घर भूत का और खाली दिमाग शैतान का। वहां कोई रहता नहीं। सारी व्यवस्थायें हमें करनी पड़ती हैं। और अगर खाली घर है तो लोग वहां जाकर न जाने क्या-क्या करते हैं। कोई पूछने वाला नहीं है। हम वहां रहते नहीं हैं। बेच देंगे तो लोग कहेंगे कि अमर सिंह की अवस्था इतनी खराब हो गयी है कि उनका घर बिक रहा है। मेरे गाँव की प्रापर्टी और मकान तो मेरे पिता जी के सभी भाइयों की साझी प्रापर्टी है। उसे तो हम बेच भी नहीं सकते। जिस मकान को मैंने संस्कार भारती को समर्पित किया है, उसे मैंने अपने पिताजी के लिए बनवाया था। वह मेरी कमाई का है। उसके रजिस्ट्री के कागजात और बिल हमारे पास हैं। उस मकान को हम शिक्षा के काम के लिए पिताजी के नाम पर ही समर्पित कर रहे हैं। वहां हरीशचन्द्र सेवा केन्द्र बन गया । दो-चार सौ, पांच सौ साल जब तक संघ रहेगा, तब तक नाम रहेगा। और वैसे भी जब तक आजमगढ़ की जातिवादी राजनीति है, जो माई (एमवाई) वहां चल रहा है मुस्लिम-यादव का तो उसके लिए जरूरी है कि वहां पर एक जरूरी ठोस काम हो, जो प्रभावी हो।

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