Saturday, September 19, 2020

जानिए शनिवार के ही दिन क्यों की जाती है पीपल वृक्ष की पूजा?

शनि देव की महादशा को दूर करने के लिए शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है। पीपल में जल चढ़ाने के साथ इसकी परिक्रमा करना भी शुभ माना गया है। मान्यता है कि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि की महादशा का असर नहीं होता। साथ ही शनि दोष को दूर करने के लिए पीपल की पूजा का विशेष महत्व है। कहते हैं कि पीपल के पेड़ की पूजा से शनि देव प्रसन्न होते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार देवासुर संग्राम में असुरों के नायक वृत्तासुर के आगे देव असहाय से हो गए थे। देवों को ज्ञात हुआ कि यदि महर्षि दधीचि की अस्थियों का अस्त्र (वज्र) बनाकर असुरराज पर प्रहार किया जाए तो उसका विनाश तय है। इस पर देवेंद्र स्वयं महर्षि दधीचि के सम्मुख देहदान करने की याचना लेकर गए।

देवेंद्र इन्द्र की याचना और देवताओं पर आए संकट के निवारण हेतु महर्षि दधीचि देह दान हेतु तैयार हो गए तथा अपने प्राण योगबल से त्याग दिए। देवताओं ने उनकी अस्थियां प्राप्त कर मांसपिंड को उनकी पत्नी को दाह हेतु दे दिया।

दाह संस्कार के समय महर्षि दधिचि की पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पाईं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयं चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़पकर चिल्लाने लगा। जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों (फल) को खाकर सुरक्षित रहा

एक दिन देवर्षि नारद वहां से गुजरे तो बालक को देखा और उसे उसका परिचय देते हुए पूरी बात बताई। बालक ने पूछा कि उसके पिता की अकला मृत्यु का कारण क्या था तो नारद जी ने बताया कि उनपर शनिदेव की महादशा थी। छोटा सा बालक बोला, यानि उसके ऊपर आई विपत्ति का कारण शनिदेव की महादशा थी।

इतना बताकर देवर्षि नारद ने बालक का नामकरण कर उसका नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया। नारद जी के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद जी के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति मांगी।

ब्रह्मा जी से वर मिलने पर पिप्पलाद ने सर्वप्रथम शनि देव का आह्वाहन किया और उनके सामने आते ही आंखें खोलकर भस्म करना शुरू कर दिया। शनिदेव को इस प्रकार जलता देख ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए तो  सूर्यदेव ने ब्रह्मा जी से विनय की। ब्रह्मा जी स्वयं पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही, साथ ही दो और वर मांगने की बात कही। इस पर पिप्पलाद ने दो वरदान मांगे-

पहला: जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा, जिससे कोई और बालक उसके जैसा अनाथ न हो।

दूसरा: मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा, उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया, तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके मुक्त कर दिया। इससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे, तभी से शनि “शनै:चरति य: शनैश्चर:” अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

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