Tuesday, October 6, 2020

बिना लालू यादव के कैसा है बिहार चुनाव का रंग ?


बिना लालू के राजद पहली बार विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Election 2020) में उतर रही है। इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनावों में भी राजद बिना लालू के ही चुनाव लड़ी थी। फ़िलहाल राजद के सुप्रीमो चारा घोटालें के कई मामलों में जेल की सजा काट रहे है।

बिहार में 43 साल बाद पहली बार यह मौका होगा जब राजद अपने सुप्रीमो के बिना चुनाव मैदान में उतरेगी। 1977 के बाद हर चुनाव में लालू प्रसाद यादव की भूमिका रही है। चाहे राजद जीते या हारे। बीते चार दशकों से लालू की बिहार की राजनीति में एक अलग ही छाप रही है।

इस बार लालू प्रसाद यादव के बिहार के विधानसभा चुनाव में नहीं रहने से उनका गंवई अन्दाज बिहार की जनता को देखने को नहीं मिलेगा। यही कारण है कि 2015 के विधानसभा चुनावों में मोदी की लोकप्रियता के बावजूद लालू की पार्टी ने भाजपा को हर मायने में पटखनी दी थी। उस समय मोदी की नकल निकालकर लालू ने खुब बिहार की जनता को हँसाया था और वोट भी बटोरे थे। उनका गंवई अन्दाज संसद से लेकर बिहार के गाँवो तक प्रसिध्द है। चुनाव जीतने के लिए जनता को किसी न किसी तरीके से लुभाना पड़ता है और राजद लालू के इस तरीके से काफ़ी वोट बटोरती है।

2015 के विधानसभा चुनावों में लालू ने नितीश कुमार का साथ लेकर मोदी-शाह की हर चाल को नाकाम कर दिया था। लोगों ने यह सोचा था कि मोदी के जादू के सामने कोई नहीं टिक पायेगा लेकिन लालू के बड़बोलेपन के सामने सबने घुटने टेक दिए थे। लालू की आम लोगों के साथ जुड़ाव की ख़ूबी का लोहा उनके विरोधी भी मानते है। 2019 का लोकसभा चुनाव राजद ने लालू के बेटों के सहारे लड़ा था और एक भी सीट वे अपनी पार्टी को जीता नहीं पाए थे|


लालू के जेल में होने से उनकी पार्टी पर बिहार की राजनीति में काफ़ी असर देखने को मिला है। 2015 में उनके होने से बिहार विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन रहा था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में उनके नहीं होने से उनकी पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी थी। यही कारण है कि इस बार बिहार चुनावों में लालू के नहीं होने से आरजेडी की स्थिति काफ़ी कमज़ोर होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

लालू के पास ही नितीश की काट

बिहार में नितीश को हराने के लिए लालू के अलावा कोई शूरमा कारगर नहीं हो सकता। लालू प्रसाद यादव विपक्ष पर आक्रामक रुख़ अपनाते थे और वैसा आक्रमण करने वाला दूसरा नेता तो बिहार में फ़िलहाल कोई भी नहीं है। ऐसे में राजद को उनकी कमी तो खलेगी। किसी भी बड़े चुनाव में लालू जैसे बड़े चेहरे का फिजिकल प्रेज़ेंस बहुत मायने रखता है।

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2019 के आम चुनाव में लोगों ने देखा था कि एनडीए गठबंधन के सामने लालू प्रसाद जेल में होने के कारण राजद कोई करिश्मा नहीं कर पाई थी, तब एनडीए ने 39 सीटें जीती थी। इससे यह साफ है कि राजद को बिना लालू के नुकसान है और जेडीयू को फ़ायदा मिलेगा। क्योंकि लालू का वोट छिटकेगा और नया वोटर मोदी की लोकप्रियता के कारण एनडीए का रूख करेगा।

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